काव्यपुष्प
काव्यपुष्प
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अपनी मर्जी से आता है
खिड़कियों पर झाँकने कोई आता है।
कुछ पल ठहर है फिर चला जाता है।
हमें खिड़कियों पर देखने क्यो आता
है ये बात सिर्फ वही बता सकता है।
दस्तक नही देता दरवाजे पर लेकिन
दिल की दीवारो तक वो चला आता है।
बोलने की कोशिश नही करता लेकिन
ख़ामोशी से बहोत कुछ कह जाता है।
बहोत कुछ था उनकी आँखों में पढ़ने
को पर वो चेहरा गुमसुम रखता है।
जाते जाते पीछे मुड़कर देखता नही
पीछे अपने कई सवाल छोड़ जाता है।
शायद अपनी मर्जी से आता है ठहर
ता है फिर वो वापिस चला जाता है।
नीक राजपूत
9898693535
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आजची चारोळी
गोड ओवी गात गात
आई जात्यावर दळायची
जीवनाच्या दुःखाची गाणी
आनंदाने गायाची.
सौ. हेमा जाधव, सातारा
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खुद को खोने आ रहा हूँ
तेरे पास मैं लंबी साँस लेने आ रहा हूँ।
आज तुझसे एक बात कहने आ रहा हूँ।
पलकों से तेरा चेहरा उतार कर मैं
अपनी आँखों में कैद करने आ रहा हूँ।
गूँजे सदा मेरे कानों मैं तू कविता सी
ऐसी सुरीली धुन बनानें आ रहा हूँ।
सब्र का धागा छोड़कर बाहो में तरी
उम्रकैद की सज़ा काट ने मैं आ रहा हूँ।
मुझसे छुटे ना कभी तेरा साथ ऐसी
तुम्हें अपनी आदत बनानें आ रहा हूँ।
आईने क़े सामने तो ख़ुदसे मिल लिए
अब मैं इसे तुम्हें मिलाने आ रहा हूँ।
तुझको बना कर अपना खुदा तेरे कांधे
पर मैं हमेंशा के लिए सोने आ रहा हूँ।
कल तक किसी मंज़िल की तलाश में
था आज मैं ख़ुद को खोने आ रहा हूँ।
नीक राजपूत
9898693535
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प्रभा फाकली
नभांगणी चौफेर
सृष्टी सजली
सोन पावली
आली किरणे खाली
धरा लाजली
रूप देखणे
मोहक प्रभातीचे
गाली हसणे
सौ उषा राऊत
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काटेरी आयुष्य
कुणाच्या पदरात काही
तर,
कुणाच्या काही...
कुणाच्या पदरात
सुख भरभरून येत
तर,
कुणाच्या पदरात दुःखच दुःख...
तसंच,
माझ्याही पदरात
एक आयुष्य आहे
मात्र,
तेही काटेरी पुंजक्याप्रमाणे
टोचणारं...
आणि सलणारं...!
सतिश कोंडू खरात
वाशिम
९४०४३७५८६९

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